मैंने देखा है ज्योतीसर को
घुमते हुए घंटो
पर देखा सिर्फ क्षण भर को
मैंने देखा है ज्योतीसर को
कहते है यहीं दिया था
गीता का उपदेश
श्री कृषण ने अर्जुन को
ख़त्म कर अधर्म को
धर्म के श्रुजन को
यहीं समझाया था भगवन ने
जन्म को मरण को
उतार कर दिखाया था
अपने ओढ़े हुए आवरण को
पर अब कहानी कुछ अलग सी है यहाँ
लोग आते हैं पूर्ण करने
अपने कुरुक्षेत्र के सफ़र को
दिख जायेंगे हजारों हज़ार पक्षी
उड़ते आसमान में
या अंडे से निकला बच्चा
घोंसले में फडफडाते अपने पर को
देख सकते हैं आप
सच और झूठ की दुकानों में
बढ़ते भूख के असर को
या देख सकते है
कीचड में कूद
कमल के फूल बेचते
गरीबी के बसर को
अर्जुन के विचारों की तरह
कमल के पात में
लुढ़कती बूँद
इधर से उधर
सोचती जाऊं मैं किधर को
एक बार फिर से
महसूस कराती हुई जरुरत
गीतोपदेश की
इस धरा, वसुंधरा
इस मनुष्य के घर को
मेरे क्षण भर के देखे हुए
आज के ज्योतीसर को
