Monday, September 20, 2010

ज्योतीसर

मैंने देखा है ज्योतीसर को

घुमते हुए घंटो

पर देखा सिर्फ क्षण भर को

मैंने देखा है ज्योतीसर को

कहते है यहीं दिया था

गीता का उपदेश

श्री कृषण ने अर्जुन को

ख़त्म कर अधर्म को

धर्म के श्रुजन को

यहीं समझाया था भगवन ने

जन्म को मरण को

उतार कर दिखाया था

अपने ओढ़े हुए आवरण को

पर अब कहानी कुछ अलग सी है यहाँ

लोग आते हैं पूर्ण करने

अपने कुरुक्षेत्र के सफ़र को

दिख जायेंगे हजारों हज़ार पक्षी

उड़ते आसमान में

या अंडे से निकला बच्चा

घोंसले में फडफडाते अपने पर को

देख सकते हैं आप

सच और झूठ की दुकानों में

बढ़ते भूख के असर को

या देख सकते है

कीचड में कूद

कमल के फूल बेचते

गरीबी के बसर को

अर्जुन के विचारों की तरह

कमल के पात में

लुढ़कती बूँद

इधर से उधर

सोचती जाऊं मैं किधर को

एक बार फिर से

महसूस कराती हुई जरुरत

गीतोपदेश की

इस धरा, वसुंधरा

इस मनुष्य के घर को

मेरे क्षण भर के देखे हुए

आज के ज्योतीसर को

Tuesday, September 14, 2010

दो सर्दियाँ

वो सर्दियों की ठंडी रातें
अक्सर लुभाती हैं मुझे
कोहरे से छन कर आती
वो स्ट्रीट लाइट की रोशनी
भर देती है उमंग मेरे मन में
गिर्द बैठ कर आंच के तापना हाथों को
समाहित कर देता है एक ऊर्जा मुझ में
बहुत बहती है मुझे ये सर्दियाँ

सड़क किनारे नंगा बदन
ओंध पड़ा हुआ है
जल कर बुझ चुकी चिंगारियों पर
शायद थोड़ी गर्मी की आस में
चुभती है उसे
वो कोहरे से हो कर आती
स्ट्रीट लाइट की रोशनी
इस सर्दी से ठिठुर कर
दम न तोड़ दे उसका बेटा
वह कोसता है इश्वर को
उसे बिलकुल नहीं बहती ये सर्दियाँ
सोचता हूँ में अक्सर
कैसे आजाती है
और क्यों आजाती है , ये सर्दियाँ
एक बार में दो तरह से ?

Friday, August 27, 2010

आओ ख्वाब बुने

आओ ख्वाब बुने
क्यों की ख्वाब हकीकत बनते है
और हकीकत है के हकीकत से अफसाने बनते है
अफसाने कुछ ऐसे बुनो
के इतिहास बनादो
और इतिहास की बुनियाद पर
भविष्य की तकदीर बनादो
तकदीर भी लेकिन मेहनत से बनती है
और मेहनत से ही सृस्ठी की गाड़ी सरकती है
गाड़ी जो जीवन की तुम्हे
है मंजिल तक पहुंचानी
तो आओ ख्वाब बुने
क्यों की ख्वाब हकीकत बनते है !

Tuesday, February 23, 2010

आत्म हत्या

मत मरो इसे ये मै हु
नहीं इसे भी मत मरो
ये भी मै हु
तुम क्यों मरते हो भाई
तुम भी तो मै हु
मै खुद से ही चिढने लगा हु
पिटता हु अपने ही हाथो,
मेरा सर ब्राहमण है
हाथ षात्रीय ,पेट वैश्य
और पैर शुद्र
साजिश है मेरे सर,
हाथ और पेट की
मेरे पैरों को काटने की
मै खुद का बैरी होगया हु
अब मै धर्मो में बाँट चूका हु
मै हिन्दू हु , मुस्लमान हु,
सिख हूँ , ईसाई हु
मै अपने अंगो को
परायों की तरह देखता हु
अब मै खुद को नहीं छोड़ूगा
मेरा पेट बिमान होगया है
सब कुछ खजाना चाहता है
शामिल है उस के साथ
मेरा सर भी
क्यों की सब कुछ
मुह से ही तो होकर गुजरता है
मेरे हाथ और पैर
ठगा सा महसूस करते है
मेरे हाथ घोंट देंगे मेरा गला
घोंप देंगे चाक़ू मेरे पेट में
मै खुद के टूकडे टूकडे कर डालूँगा
चल पड़ा हूँ मै
आत्महत्या करने

Thursday, February 18, 2010

अब बदलने दो

हर व्यक्ति जो जिन्दा है आवाज़ दे

जागने का सबको वो पैगाम दे

सूनी पड़ी है धरा कब्रिस्तान सी

चीखो के हर आँख को खुल जाने दे

उठने दो लहरों को ऊँचा इतना

तारों को संग उन के बह जाने दे

लगाओ आग धरा पे ऐसी

के उसमे सूर्य को जल जाने दे

बहाने दो गंगा की धार को हर एक इंच पर

देखो बात सब के पाप को धुल जाने दे रहारहा

धो रहा है सदियों से जो ईंटे

उस मैले कुचैले मजदूर को नहाने दे

आने दो भूचाल ऐसा

काले कल को मिटटी में मिल जाने दे

और जागने के बाद सब के

नया घरोंदा फिर बसाने दे