Thursday, February 18, 2010

अब बदलने दो

हर व्यक्ति जो जिन्दा है आवाज़ दे

जागने का सबको वो पैगाम दे

सूनी पड़ी है धरा कब्रिस्तान सी

चीखो के हर आँख को खुल जाने दे

उठने दो लहरों को ऊँचा इतना

तारों को संग उन के बह जाने दे

लगाओ आग धरा पे ऐसी

के उसमे सूर्य को जल जाने दे

बहाने दो गंगा की धार को हर एक इंच पर

देखो बात सब के पाप को धुल जाने दे रहारहा

धो रहा है सदियों से जो ईंटे

उस मैले कुचैले मजदूर को नहाने दे

आने दो भूचाल ऐसा

काले कल को मिटटी में मिल जाने दे

और जागने के बाद सब के

नया घरोंदा फिर बसाने दे

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