Sunday, February 19, 2017

तू इश्क कुछ बेवफाई से करती है
ये दग़ाबाज़ी बड़ी सफाई से करती है

Wednesday, February 8, 2017

सड़क


बनाली है इक सड़क
चलने के लिए अपने हिसाब से
कुछ मौका परस्त लोगों ने

इस सड़क के इक तरफ
दरख़्त हैं , हरियाली है,
ऐशो आराम है, ऊँची इमारतें
गाड़ियां, खुशाली है!

दूसरी तरफ
रेत है, बंजर है,
सूखा है, बदहाली है
समाज का डर, पसीना,
रोटी की दौड़, तंगहाली है!

इस सड़क से ग़ुज़र कर
सिंहासन तक पहुंचने मत देना उन को
उखाड़ दो सारा डाम्बर
बिखेर दो बजरियां
मिल जाने दो
बदहाली में खुशाली को
उगजाने दो बंजर में
हरियाली को

Monday, May 7, 2012

 मै लिखुंगा शायरी इस घिरे बादल  पे  आज 
तूने दिल को छू लिया है सरफिरे पागल  के  आज 
बादलों ने रंग  चुराए  है तेरी काजल  के आज 
मेघ  बरसे खूब  बरसे  बस  तेरे आँचल  पे आज 

Sunday, March 4, 2012

कभी आबाद नगर सी तुम


कभी आबाद नगर सी तुम कभी वीरान खंडहर सी
कभी हो आग सूरज की कभी हो शीतल चन्दन सी
चाहे जो भी देखलो तुझमे तुम हो बिलकुल दर्पण सी
भेंट हो तुम मेरे जीवन में जैसे मुझ को अर्पण सी
कभी हो लगती घुटन उमस की कभी हवा दीवानी सी
कभी तो ठहरी झील हो तुम कभी हो बहते पानी सी
कभी तो भोले बच्चे सी तुम कभी बड़ी सयानी सी
सच हो तुम मेरे जीवन का या हो एक कहानी सी
कभी समाहित भीड़ है तुझमे कभी खडी अकेली सी
कभी झोपड़ी बस्ती की तुम कभी दूर पड़ी हवेली सी
कभी तो बिलकुल अनजानी हो कभी हो मेरी सहेली सी
मै तुझको ना समझ सका तुम हो निरी पहेली सी

Monday, September 20, 2010

ज्योतीसर

मैंने देखा है ज्योतीसर को

घुमते हुए घंटो

पर देखा सिर्फ क्षण भर को

मैंने देखा है ज्योतीसर को

कहते है यहीं दिया था

गीता का उपदेश

श्री कृषण ने अर्जुन को

ख़त्म कर अधर्म को

धर्म के श्रुजन को

यहीं समझाया था भगवन ने

जन्म को मरण को

उतार कर दिखाया था

अपने ओढ़े हुए आवरण को

पर अब कहानी कुछ अलग सी है यहाँ

लोग आते हैं पूर्ण करने

अपने कुरुक्षेत्र के सफ़र को

दिख जायेंगे हजारों हज़ार पक्षी

उड़ते आसमान में

या अंडे से निकला बच्चा

घोंसले में फडफडाते अपने पर को

देख सकते हैं आप

सच और झूठ की दुकानों में

बढ़ते भूख के असर को

या देख सकते है

कीचड में कूद

कमल के फूल बेचते

गरीबी के बसर को

अर्जुन के विचारों की तरह

कमल के पात में

लुढ़कती बूँद

इधर से उधर

सोचती जाऊं मैं किधर को

एक बार फिर से

महसूस कराती हुई जरुरत

गीतोपदेश की

इस धरा, वसुंधरा

इस मनुष्य के घर को

मेरे क्षण भर के देखे हुए

आज के ज्योतीसर को

Tuesday, September 14, 2010

दो सर्दियाँ

वो सर्दियों की ठंडी रातें
अक्सर लुभाती हैं मुझे
कोहरे से छन कर आती
वो स्ट्रीट लाइट की रोशनी
भर देती है उमंग मेरे मन में
गिर्द बैठ कर आंच के तापना हाथों को
समाहित कर देता है एक ऊर्जा मुझ में
बहुत बहती है मुझे ये सर्दियाँ

सड़क किनारे नंगा बदन
ओंध पड़ा हुआ है
जल कर बुझ चुकी चिंगारियों पर
शायद थोड़ी गर्मी की आस में
चुभती है उसे
वो कोहरे से हो कर आती
स्ट्रीट लाइट की रोशनी
इस सर्दी से ठिठुर कर
दम न तोड़ दे उसका बेटा
वह कोसता है इश्वर को
उसे बिलकुल नहीं बहती ये सर्दियाँ
सोचता हूँ में अक्सर
कैसे आजाती है
और क्यों आजाती है , ये सर्दियाँ
एक बार में दो तरह से ?

Friday, August 27, 2010

आओ ख्वाब बुने

आओ ख्वाब बुने
क्यों की ख्वाब हकीकत बनते है
और हकीकत है के हकीकत से अफसाने बनते है
अफसाने कुछ ऐसे बुनो
के इतिहास बनादो
और इतिहास की बुनियाद पर
भविष्य की तकदीर बनादो
तकदीर भी लेकिन मेहनत से बनती है
और मेहनत से ही सृस्ठी की गाड़ी सरकती है
गाड़ी जो जीवन की तुम्हे
है मंजिल तक पहुंचानी
तो आओ ख्वाब बुने
क्यों की ख्वाब हकीकत बनते है !