कभी हो आग सूरज की कभी हो शीतल चन्दन सी
चाहे जो भी देखलो तुझमे तुम हो बिलकुल दर्पण सी
भेंट हो तुम मेरे जीवन में जैसे मुझ को अर्पण सी
कभी हो लगती घुटन उमस की कभी हवा दीवानी सी
कभी तो ठहरी झील हो तुम कभी हो बहते पानी सी
कभी तो भोले बच्चे सी तुम कभी बड़ी सयानी सी
सच हो तुम मेरे जीवन का या हो एक कहानी सी
कभी समाहित भीड़ है तुझमे कभी खडी अकेली सी
कभी झोपड़ी बस्ती की तुम कभी दूर पड़ी हवेली सी
कभी तो बिलकुल अनजानी हो कभी हो मेरी सहेली सी
मै तुझको ना समझ सका तुम हो निरी पहेली सी
