Tuesday, September 14, 2010

दो सर्दियाँ

वो सर्दियों की ठंडी रातें
अक्सर लुभाती हैं मुझे
कोहरे से छन कर आती
वो स्ट्रीट लाइट की रोशनी
भर देती है उमंग मेरे मन में
गिर्द बैठ कर आंच के तापना हाथों को
समाहित कर देता है एक ऊर्जा मुझ में
बहुत बहती है मुझे ये सर्दियाँ

सड़क किनारे नंगा बदन
ओंध पड़ा हुआ है
जल कर बुझ चुकी चिंगारियों पर
शायद थोड़ी गर्मी की आस में
चुभती है उसे
वो कोहरे से हो कर आती
स्ट्रीट लाइट की रोशनी
इस सर्दी से ठिठुर कर
दम न तोड़ दे उसका बेटा
वह कोसता है इश्वर को
उसे बिलकुल नहीं बहती ये सर्दियाँ
सोचता हूँ में अक्सर
कैसे आजाती है
और क्यों आजाती है , ये सर्दियाँ
एक बार में दो तरह से ?

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