मत मरो इसे ये मै हु
नहीं इसे भी मत मरो
ये भी मै हु
तुम क्यों मरते हो भाई
तुम भी तो मै हु
मै खुद से ही चिढने लगा हु
पिटता हु अपने ही हाथो,
मेरा सर ब्राहमण है
हाथ षात्रीय ,पेट वैश्य
और पैर शुद्र
साजिश है मेरे सर,
हाथ और पेट की
मेरे पैरों को काटने की
मै खुद का बैरी होगया हु
अब मै धर्मो में बाँट चूका हु
मै हिन्दू हु , मुस्लमान हु,
सिख हूँ , ईसाई हु
मै अपने अंगो को
परायों की तरह देखता हु
अब मै खुद को नहीं छोड़ूगा
मेरा पेट बिमान होगया है
सब कुछ खजाना चाहता है
शामिल है उस के साथ
मेरा सर भी
क्यों की सब कुछ
मुह से ही तो होकर गुजरता है
मेरे हाथ और पैर
ठगा सा महसूस करते है
मेरे हाथ घोंट देंगे मेरा गला
घोंप देंगे चाक़ू मेरे पेट में
मै खुद के टूकडे टूकडे कर डालूँगा
चल पड़ा हूँ मै
आत्महत्या करने
Tuesday, February 23, 2010
Thursday, February 18, 2010
अब बदलने दो
हर व्यक्ति जो जिन्दा है आवाज़ दे
जागने का सबको वो पैगाम दे
सूनी पड़ी है धरा कब्रिस्तान सी
चीखो के हर आँख को खुल जाने दे
उठने दो लहरों को ऊँचा इतना
तारों को संग उन के बह जाने दे
लगाओ आग धरा पे ऐसी
के उसमे सूर्य को जल जाने दे
बहाने दो गंगा की धार को हर एक इंच पर
देखो बात सब के पाप को धुल जाने दे रहारहा
धो रहा है सदियों से जो ईंटे
उस मैले कुचैले मजदूर को नहाने दे
आने दो भूचाल ऐसा
काले कल को मिटटी में मिल जाने दे
और जागने के बाद सब के
नया घरोंदा फिर बसाने दे
Subscribe to:
Posts (Atom)
